त्योहार और व्रत1 अक्टूबर 2026

दिवाली 2026 (8 नवंबर): लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और देरी की वजह

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दिवाली 2026 रविवार, 8 नवंबर 2026 को है, यानी कार्तिक मास की अमावस्या की रात। मुख्य लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल में होती है - सूर्यास्त के ठीक बाद का गोधूलि समय। दिल्ली में 8 नवंबर को प्रदोष काल शाम 5:32 से रात 8:08 बजे तक है, और पूजा का मुहूर्त शाम 5:55 से 7:50 बजे तक (भारतीय समय) है। पूरा पर्व पांच दिन का है - शुक्रवार, 6 नवंबर को धनतेरस से लेकर बुधवार, 11 नवंबर 2026 को भाई दूज तक।

दिवाली 2026: एक नजर में

दिवाली, जिसे दीपावली भी कहते हैं - यानी दीपों की पंक्ति - हिंदू कैलेंडर में सबसे ज्यादा जगहों पर मनाया जाने वाला त्योहार है। यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है, और धन व समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी का साफ-सुथरे, रोशनी से जगमगाते घर में स्वागत करने का भी। 2026 में यह त्योहार सामान्य से काफी देर से, नवंबर के दूसरे हफ्ते में आ रहा है, और इसका एक साफ खगोलीय कारण है, जो नीचे बताया गया है।

अवसरतारीख और समय (2026)
दिवाली / लक्ष्मी पूजारविवार, 8 नवंबर 2026
अमावस्या तिथि8 नवंबर को लगभग सुबह 11:28 बजे शुरू, पूरी रात रहेगी
लक्ष्मी पूजा मुहूर्तदिल्ली के लिए शाम 5:55 से 7:50 बजे तक, प्रदोष काल (शाम 5:32 से रात 8:08 बजे) के भीतर; शहर के अनुसार बदलता है
निशीथ काल (आधी रात की पूजा, काली पूजा)लगभग 8 नवंबर की रात 11:39 से 9 नवंबर की रात 12:31 बजे तक

समय हर शहर में कुछ मिनट आगे-पीछे होता है, क्योंकि इसकी गणना स्थानीय सूर्यास्त से होती है। हमारे दैनिक पंचांग में आपके शहर के सूर्यास्त और तिथि का समय दिया गया है; आपके शहर के लिए मुहूर्त आपके पुरोहित जी पक्का कर सकते हैं।

2026 में दिवाली इतनी देर से क्यों?

अगर आप सोच रहे हैं कि दिवाली आम तौर पर अक्टूबर में आती है तो इस साल नवंबर में क्यों है, तो इसका जवाब है अधिक मास, यानी 2026 का अतिरिक्त चंद्र मास। हिंदू चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है। त्योहारों को ऋतुओं के साथ बनाए रखने के लिए लगभग हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहते हैं; इसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है।

2026 में अधिक मास मई के मध्य से जून के मध्य तक, दूसरे ज्येष्ठ मास के रूप में है। यह अतिरिक्त महीना त्योहारों के मौसम से पहले पड़ता है, इसलिए गुरु पूर्णिमा से आगे के सभी बड़े त्योहार लगभग 18 से 20 दिन देर से आते हैं। यही कारण है कि 2026 में नवरात्रि और दशहरा भी देर से आ रहे हैं, और दिवाली 8 नवंबर को पड़ रही है - 2025 की तारीख 20 अक्टूबर से 19 दिन बाद। कैलेंडर में कोई गड़बड़ी नहीं है; यह हिंदू चंद्र-सौर पंचांग की अपने आप संतुलन बनाने वाली व्यवस्था है, जो ठीक वैसे ही काम कर रही है जैसे उसे करना चाहिए।

दिवाली 2026: पांच दिनों का कैलेंडर

दिवाली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि पांच पर्वों की एक श्रृंखला है, और हर पर्व के अपने देवता, अपनी कथा और अपनी विधियां हैं।

दिनतारीखपर्वमहत्व
दिन 1शुक्रवार, 6 नवंबर 2026धनतेरसभगवान धन्वंतरि, कुबेर और लक्ष्मी की पूजा; सोना, चांदी या बर्तन खरीदना समृद्धि को न्योता देता है
दिन 2शनिवार, 7 नवंबर 2026नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)राक्षस नरकासुर पर भगवान कृष्ण की जीत की याद; छोटी दिवाली के दीये इसी शाम जलाए जाते हैं, हालांकि पंचांगों में नरक चतुर्दशी 8 नवंबर को दी गई है, और उसी सुबह अभ्यंग स्नान का समय सुबह 5:41 से 6:37 बजे तक है
दिन 3रविवार, 8 नवंबर 2026दिवाली / लक्ष्मी पूजामुख्य रात; सूर्यास्त के बाद दीयों से जगमगाते घर में लक्ष्मी और गणेश की पूजा
दिन 4मंगलवार, 10 नवंबर 2026गोवर्धन पूजा / अन्नकूटश्रीकृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने की याद; भोग के व्यंजनों का पहाड़ तैयार किया जाता है
दिन 5बुधवार, 11 नवंबर 2026भाई दूजबहनें भाइयों की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं; तिलक की रस्म इस रिश्ते को और पक्का करती है

पांचों दिन कैसे मनाए जाते हैं

दिन 1: धनतेरस, शुक्रवार, 6 नवंबर

धनतेरस, यानी धनत्रयोदशी, से इस पर्व की शुरुआत होती है; यह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है। यह भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य दिवस है - देवताओं के वैद्य, जो समुद्र मंथन से अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे, वही अमृत जो अमर बनाता है। लोग घर की सफाई करते हैं, सोना, चांदी या नए बर्तन खरीदते हैं, और इस मौसम के पहले दीये जलाते हैं। शाम को मृत्यु के देवता यमराज के लिए घर के बाहर एक विशेष दीपक रखा जाता है, जिसे यम दीपक कहते हैं, और परिवार की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। पूरे मुहूर्त, खरीदारी की जानकारी और पूजा की विधि के लिए धनतेरस 2026 पर हमारा विस्तृत लेख पढ़ें।

दिन 2: नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली, शनिवार, 7 नवंबर

नरक चतुर्दशी उस घटना की याद में मनाई जाती है जब भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के साथ मिलकर राक्षसराज नरकासुर का वध किया और बंदी बनाई गई सोलह हजार राजकुमारियों को मुक्त कराया। उत्तर भारत में यह दिन छोटी दिवाली के रूप में मनाया जाता है, जब शाम को कुछ दीये जलाकर मुख्य रात की हल्की-सी शुरुआत की जाती है। इस दिन की मुख्य विधि अभ्यंग स्नान है - सूर्योदय से पहले शरीर पर तेल लगाकर किया जाने वाला स्नान, जिसके बारे में माना जाता है कि यह पाप और नकारात्मकता को धो देता है। 2026 में चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर की सुबह शुरू होकर 8 नवंबर की देर सुबह तक रहती है, इसलिए अभ्यंग स्नान असल में रविवार, 8 नवंबर को भोर में होगा - आपके शहर के सूर्योदय के अनुसार लगभग सुबह 5:41 से 6:37 बजे के बीच।

दिन 3: दिवाली और लक्ष्मी पूजा, रविवार, 8 नवंबर

यही इस पर्व का मुख्य दिन है। अमावस्या की रात, जो महीने की सबसे अंधेरी रात होती है, घरों को दीयों की कतारों से रोशन किया जाता है, और विघ्नहर्ता भगवान गणेश के साथ विधिवत पूजा करके मां लक्ष्मी को घर में आमंत्रित किया जाता है। पूजा प्रदोष काल में होती है, यानी सूर्यास्त से शुरू होने वाले समय में, जब स्थिर लग्न - यानी उस समय पूर्व क्षितिज पर उदित हो रही स्थिर राशि - को सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इससे घर में लक्ष्मी की कृपा स्थिर, यानी टिकाऊ और लंबे समय तक बनी रहती है। दिल्ली के लिए पूजा मुहूर्त शाम 5:55 से 7:50 बजे तक है, प्रदोष काल (शाम 5:32 से रात 8:08 बजे) के भीतर; आपके शहर का सटीक समय पंचांग पेज पर है। पूरी सामग्री सूची के साथ चरण-दर-चरण विधि हमारे लक्ष्मी पूजा विधि वाले लेख में दी गई है।

दिन 4: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट, मंगलवार, 10 नवंबर

गोवर्धन पूजा उस प्रसंग की याद में होती है जब बालक कृष्ण ने इंद्र की प्रचंड वर्षा से ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था; इसकी सीख है कि भक्ति और प्रकृति के उपहार अहंकार से बढ़कर हैं। घरों में गोबर या अन्न से पर्वत के प्रतीक के रूप में छोटा-सा टीला बनाया जाता है, और मंदिरों में अन्नकूट तैयार होता है - जिसका शाब्दिक अर्थ है अन्न का पहाड़ - जिसमें दर्जनों या सैकड़ों शाकाहारी व्यंजनों का श्रीकृष्ण को भोग लगाया जाता है। दिल्ली के लिए प्रातःकाल पूजा मुहूर्त 10 नवंबर को सुबह 6:40 से 8:49 बजे तक है। गुजरात में यह दिन बेसतु वरस, यानी नए साल के रूप में भी मनाया जाता है।

दिन 5: भाई दूज, बुधवार, 11 नवंबर

पर्व का समापन भाई दूज से होता है, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं: महाराष्ट्र में भाऊबीज, बंगाल में भाई फोंटा और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में भगिनी हस्त भोजनम्। बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं, और भाई बदले में उपहार देते हैं। मान्यता है कि इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने गए थे और उन्होंने बहन से तिलक करवाने वाले सभी भाइयों को आशीर्वाद दिया था। तिलक के लिए अपराह्न काल, यानी दोपहर की शुरुआत का समय, उचित माना जाता है - 11 नवंबर को लगभग दोपहर 1:10 से 3:19 बजे तक। ध्यान दें कि द्वितीया तिथि 10 नवंबर की दोपहर से शुरू हो जाती है, इसलिए कुछ परिवार भाई दूज 10 नवंबर को मनाते हैं; ज्यादातर पंचांग इसे बुधवार, 11 नवंबर को मानते हैं।

क्षेत्रीय अंतर: एक पर्व, अनेक परंपराएं

दिवाली पूरे भारत में मनाई जाती है, लेकिन हर जगह एक जैसी नहीं।

  • उत्तर भारत: मुख्य आयोजन अमावस्या की रात की लक्ष्मी पूजा है, जो चौदह वर्ष के वनवास के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने से जुड़ी है, जब उनके स्वागत में पूरी नगरी दीयों से जगमगा उठी थी।
  • तमिलनाडु और केरल: दीपावली अमावस्या की बजाय नरक चतुर्दशी पर मनाई जाती है। उत्सव की शुरुआत भोर से पहले तेल स्नान, नए कपड़ों और सुबह के पटाखों से होती है। 2026 में यह तेल स्नान रविवार, 8 नवंबर को भोर में पड़ रहा है, इसलिए इस साल उत्तर और दक्षिण भारत ज्यादातर एक ही तारीख को दिवाली मनाएंगे।
  • कर्नाटक: दीपावली नरक चतुर्दशी के तेल स्नान से लेकर चौथे दिन बलि पाड्यमी तक चलती है, जब राजा बलि की पूजा होती है; यह वही प्रतिपदा है जिसे उत्तर भारत गोवर्धन पूजा के रूप में मनाता है।
  • पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम: यही अमावस्या की रात मां काली को समर्पित होती है। काली पूजा निशीथ काल यानी आधी रात के समय होती है - 2026 में कोलकाता में लगभग रात 10:55 से 11:46 बजे तक। बंगाल में इससे एक दिन पहले भूत चतुर्दशी होती है, जब पितरों के लिए चौदह दीये जलाए जाते हैं और चौदह तरह के साग से बनी एक सब्जी (चोद्दो शाक) खाई जाती है; ज्यादातर बंगाली घर अपनी मुख्य लक्ष्मी पूजा कोजागरी पूर्णिमा को करते हैं, यानी दुर्गा पूजा के बाद की पूर्णिमा को, और वहां भाई दूज भाई फोंटा कहलाती है।
  • ओडिशा: शाम ढलते ही परिवार जूट की डंडियां (कौंरिआ काठि) जलाते हैं और पितरों को अंधकार से प्रकाश में आने के लिए पुकारते हैं; इस विधि को बड़ बडुआ डाका कहते हैं।
  • गोवा: नरक चतुर्दशी को भोर से पहले कागज से बने नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं।
  • गुजरात: दिवाली पर साल का अंत होता है; इस दिन चोपड़ा पूजन, यानी नए बही-खातों की पूजा की जाती है, और गुजराती नया साल, बेसतु वरस, गोवर्धन पूजा के दिन पड़ता है।
  • महाराष्ट्र: यह पर्व धनतेरस से पहले की वसुबारस से लेकर भाऊबीज तक चलता है, जिसमें अभ्यंग स्नान और त्योहार के फराल (पकवान) पर खास जोर रहता है। चौथा दिन बलि पड़वा है, जिसे साढ़े तीन मुहूर्तों में आधा मुहूर्त गिना जाता है।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिवाली के साथ ही छठ पूजा की उलटी गिनती भी शुरू हो जाती है - सूर्य उपासना का यह महापर्व लगभग एक हफ्ते बाद, 13 नवंबर को नहाय खाय के साथ शुरू होता है।

अमावस्या पर लक्ष्मी पूजा का महत्व

प्रकाश और धन की देवी की पूजा महीने की सबसे अंधेरी रात को होती है। एक लोकप्रिय मान्यता है कि लक्ष्मी इसी रात सागर से प्रकट हुई थीं, और सूर्यास्त के बाद वे धरती पर ऐसे घरों की तलाश में घूमती हैं जो साफ-सुथरे हों, स्वागत के लिए तैयार हों और रोशनी से भरे हों। दीये केवल सजावट नहीं हैं; वे निमंत्रण हैं। इस पूजा में लक्ष्मी के साथ गणेश जी हमेशा पूजे जाते हैं, क्योंकि बुद्धि के बिना धन अधूरा माना जाता है; इसीलिए दिवाली की हर पूजा में सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है।

बहुत से लोग दिवाली की लक्ष्मी पूजा किसी प्रशिक्षित पुरोहित से करवाना पसंद करते हैं, ताकि संकल्प, मंत्र और अर्पण मुहूर्त के भीतर सही ढंग से हो सकें। अगर आप इस साल ऐसी मदद चाहते हैं, तो Purohit.app के जरिए जांचे-परखे पुरोहित के लिए अनुरोध भेज सकते हैं, और बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे और चेन्नई जैसे शहरों में अनुभवी पुरोहित आपके घर आकर पूजा करवा सकते हैं।

दिवाली 2026 की तैयारी

  • सफाई जल्दी शुरू करें। परंपरा के अनुसार घर की पूरी सफाई और छोटी-मोटी मरम्मत धनतेरस से पहले पूरी कर ली जाती है, क्योंकि कहा जाता है कि लक्ष्मी साफ-सुथरे, संवरे हुए घरों पर कृपा करती हैं।
  • धनतेरस की खरीदारी की योजना बनाएं। सोना, चांदी, बर्तन और यहां तक कि नई झाड़ू भी 6 नवंबर को खरीदी जाती है; देखें धनतेरस खरीदारी गाइड।
  • पूजा सामग्री पहले से जुटा लें। लक्ष्मी पूजा की पूरी सामग्री सूची विधि और सामग्री गाइड में है।
  • अपने शहर का मुहूर्त नोट कर लें। भारत में अलग-अलग जगहों पर सूर्यास्त में एक घंटे तक का फर्क होता है, इसलिए अपने शहर का प्रदोष काल पंचांग पर पक्का कर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में दिवाली किस तारीख को है?

दिवाली 2026 रविवार, 8 नवंबर 2026 को है। उसी शाम, कार्तिक अमावस्या की रात, प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजा की जाती है।

2026 में दिवाली देर से क्यों है?

क्योंकि 2026 में अधिक मास है - चंद्र और सौर कैलेंडर को फिर से मिलाने के लिए मई के मध्य से जून के मध्य तक जोड़ा गया एक अतिरिक्त चंद्र मास। इसकी वजह से इसके बाद के सभी त्योहार लगभग 18 से 20 दिन देर से आते हैं, और दिवाली अपने सामान्य समय, अक्टूबर के आखिर से खिसककर 8 नवंबर को आ गई है।

दिवाली 2026 पर लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त क्या है?

दिल्ली के लिए लक्ष्मी पूजा मुहूर्त 8 नवंबर 2026 को शाम 5:55 से 7:50 बजे तक है, प्रदोष काल (शाम 5:32 से रात 8:08 बजे) के भीतर। दूसरे शहरों में यह समय कुछ मिनट आगे-पीछे होता है, क्योंकि यह स्थानीय सूर्यास्त पर निर्भर करता है, इसलिए सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।

दिवाली 2026 के पांच दिन कौन-से हैं?

शुक्रवार 6 नवंबर को धनतेरस, शनिवार 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली, रविवार 8 नवंबर को लक्ष्मी पूजा, मंगलवार 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा, और बुधवार 11 नवंबर 2026 को भाई दूज।

क्या 2026 में दक्षिण भारत में दीपावली अलग दिन है?

तमिलनाडु और केरल में दीपावली नरक चतुर्दशी पर भोर से पहले के तेल स्नान के साथ मनाई जाती है। 2026 में यह स्नान रविवार, 8 नवंबर को भोर में पड़ रहा है, इसलिए इस साल उत्तर और दक्षिण भारत ज्यादातर एक ही तारीख को दिवाली मनाएंगे।

2026 में भाई दूज कब है?

भाई दूज बुधवार, 11 नवंबर 2026 को है, और तिलक का मुहूर्त दोपहर में, लगभग 1:10 से 3:19 बजे तक है। द्वितीया तिथि 10 नवंबर की दोपहर से शुरू हो जाती है, इसलिए कुछ परिवार इसे 10 नवंबर को मनाते हैं, लेकिन ज्यादातर पंचांग 11 नवंबर बताते हैं।

क्या लक्ष्मी पूजा आधी रात को की जा सकती है?

हां। कुछ परंपराओं में निशीथ काल, यानी 8 नवंबर की रात लगभग 11:39 से 9 नवंबर की रात 12:31 बजे तक का समय, पूजा के लिए लिया जाता है, और बंगाल में काली पूजा का मुख्य समय यही है। ज्यादातर घरों के लिए सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल ही सबसे उचित समय माना जाता है।

दिवाली की रात किन देवी-देवताओं की पूजा होती है?

मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की साथ में पूजा होती है, और पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। कई लोग इसी पूजा में सरस्वती, कुबेर और अपने बही-खातों या रोजी-रोटी के औजारों की भी पूजा करते हैं।

हम कैसे जाँचते हैं: हमारी गाइड में दी गई तिथियाँ और मुहूर्त प्रकाशित करने से पहले पंचांग से मिलाए जाते हैं, और व्यावहारिक बातें - सामग्री, समय, दक्षिणा - Purohit.app पर हुई असली बुकिंग पर आधारित हैं। परंपराएँ समुदाय के अनुसार अलग होती हैं; आपके पुरोहित की सलाह ही मान्य है। यह पेज हमारी अंग्रेज़ी गाइड का अनुवाद है। कहीं कोई बात अलग लगे, तो अंग्रेज़ी पेज को ही सही मानें।

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