त्योहार और व्रत12 अक्टूबर 2026

छठ पूजा 2026 (13-16 नवंबर): डूबते सूर्य को पहले अर्घ्य क्यों

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छठ पूजा 2026 शुक्रवार, 13 नवंबर को नहाय-खाय से शुरू होगी और सोमवार, 16 नवंबर 2026 को उषा अर्घ्य के साथ पूरी होगी। पूजा की मुख्य शाम, संध्या अर्घ्य, रविवार, 15 नवंबर 2026 को है, जब श्रद्धालु डूबते सूर्य को अर्घ्य (जल और प्रसाद का अर्पण) देते हैं। 2026 अधिक मास का साल है, यानी एक अतिरिक्त चंद्र मास ने पूरे त्योहारी मौसम को सामान्य से आगे खिसका दिया है, इसीलिए इस साल छठ का पर्व नवंबर के मध्य में आ रहा है।

छठ पूजा 2026: चारों दिन का कैलेंडर

छठ का पर्व हिंदू पंचांग के कार्तिक मास में चार दिन मनाया जाता है, चतुर्थी (चौथी तिथि) से सप्तमी (सातवीं तिथि) तक। पर्व का केंद्र कार्तिक शुक्ल षष्ठी, यानी छठी तिथि है, जिससे छठ को उसका नाम मिला है। एक दूसरी छठ, चैती छठ, चैत्र महीने में इसी तरह मनाई जाती है। 2026 का पूरा कैलेंडर यह है:

दिनतारीखअनुष्ठानक्या होता है
दिन 1शुक्रवार, 13 नवंबर 2026नहाय-खायपवित्र स्नान, घर की सफाई, एक बार शुद्ध सात्विक भोजन
दिन 2शनिवार, 14 नवंबर 2026खरनादिनभर का उपवास, जो सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर और रोटी से खुलता है
दिन 3रविवार, 15 नवंबर 2026संध्या अर्घ्यघाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य; 36 घंटे का निर्जला व्रत जारी रहता है
दिन 4सोमवार, 16 नवंबर 2026उषा अर्घ्यउगते सूर्य को अर्घ्य; पारण (व्रत खोलना)

अर्घ्य 15 नवंबर को ठीक सूर्यास्त के समय और 16 नवंबर को ठीक सूर्योदय के समय देना होता है। उत्तर भारत के ज्यादातर शहरों में नवंबर के मध्य में सूर्यास्त मोटे तौर पर शाम 5:00 से 5:30 बजे (भारतीय समय) के बीच होता है, और सूर्योदय आपके शहर के हिसाब से लगभग सुबह 5:50 से 6:50 बजे (भारतीय समय) के बीच, लेकिन सटीक मिनट हर शहर में अलग होता है। घाट जाने की योजना बनाने से पहले हमारे दैनिक पंचांग पर अपने शहर का सटीक सूर्योदय और सूर्यास्त देख लें।

छठ से लोगों का इतना गहरा लगाव क्यों है

छठ सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। छठी मैया वह मातृ देवी हैं, जो मान्यता के अनुसार बच्चों की रक्षा करती हैं और संतान, सेहत और समृद्धि देती हैं। लोक परंपरा में छठी मैया को सूर्य की बहन माना जाता है, और बहुत से लोग उन्हें उषा, यानी भोर, से या षष्ठी देवी से जोड़ते हैं, जिन्हें ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत पुराण प्रकृति का छठा अंश और बच्चों की रक्षक बताते हैं।

दो बातें छठ को हिंदू त्योहारों में अनोखा बनाती हैं। पहली, यह उन गिने-चुने मौकों में से है जब उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य की पूजा होती है। यह परंपरा जीवन के पूरे चक्र के प्रति कृतज्ञता सिखाती है: ढलते सूर्य का उतनी ही श्रद्धा से सम्मान, जितना उगते सूर्य का। दूसरी, छठ में न मूर्ति चाहिए, न मंदिर, और मुख्य अर्घ्य के लिए न पुरोहित। व्रती, जल और सूर्य, तीनों का सीधा मिलन होता है।

यह पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र की आत्मा है, और इन इलाकों के लोग जहां भी जाकर बसे हैं, दिल्ली और मुंबई से लेकर बेंगलुरु और उससे आगे तक, वहां अब हर कार्तिक में घाटों पर रौनक छा जाती है।

चारों दिन विस्तार से

दिन 1: नहाय-खाय (13 नवंबर 2026)

नहाय-खाय का शाब्दिक अर्थ है "नहाओ और खाओ"। व्रती (व्रत रखने वाला व्यक्ति, ज्यादातर घर की मां, हालांकि पुरुष भी यह व्रत रखते हैं) पवित्र डुबकी लगाती हैं, परंपरा से गंगा जैसी किसी नदी में, और भोजन बनाने के लिए पवित्र जल घर लाती हैं। घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है। व्रती दिन में एक ही बार पूरी तरह सात्विक भोजन करती हैं, आमतौर पर कद्दू-भात: लौकी-चने की दाल और भात, जो बिना प्याज-लहसुन के नए या मिट्टी के चूल्हे पर बनता है। इसी भोजन से छठ का अनुशासन शुरू होता है।

दिन 2: खरना (14 नवंबर 2026)

खरना के दिन व्रती सूर्योदय से सूर्यास्त तक बिना पानी के उपवास रखती हैं। सूर्यास्त के बाद वे ताजा बनी गुड़ की खीर (चावल की खीर, जो गुड़ से मीठी की जाती है, चीनी से कभी नहीं) और रोटियां छठी मैया को अर्पित करती हैं, फिर यही उनका दिन का एकमात्र भोजन होता है, जिसे वे अक्सर किसी शांत, एकांत जगह में अकेले बैठकर ग्रहण करती हैं। घर के लोगों को यही खीर प्रसाद के रूप में मिलती है। यह भोजन पूरा होते ही महाव्रत शुरू हो जाता है: लगभग 36 घंटे बिना अन्न-जल के, जो चौथे दिन के सूर्योदय तक चलता है।

दिन 3: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर 2026)

यही वह शाम है जिसका पूरे समाज को इंतजार रहता है। दिनभर घर में प्रसाद बनता है, और दोपहर तक लोग ठेकुआ, फल और गन्ने से भरे बांस के दउरा और सूप लेकर टोली में घाट की ओर, यानी नदी या तालाब के किनारे, चल पड़ते हैं। व्रती कमर तक पानी में खड़ी होती हैं और जैसे ही सूर्य क्षितिज को छूता है, अर्घ्य देती हैं: जुड़े हाथों से या लोटे से जल और दूध अर्पित किया जाता है, और प्रसाद से भरा सूप सूर्य की ओर उठाया जाता है। हवा में छठी मैया के लोकगीत गूंजते हैं। कई लोग घाट पर दीये भी जलाते हैं, जो दिवाली के दीयों की याद दिलाते हैं; 2026 में दिवाली इससे ठीक एक हफ्ता पहले है।

दिन 4: उषा अर्घ्य (16 नवंबर 2026)

भोर से पहले, अंधेरे में ही, लोग उसी घाट पर लौटते हैं। जैसे ही सूर्य की पहली झलक दिखती है, व्रती उगते सूर्य को सुबह का अर्घ्य देती हैं, और यह चक्र पूरा होता है। परिवार की सेहत और बच्चों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की जाती है। इसके बाद व्रती पारण करती हैं, यानी 36 घंटे का व्रत खोलती हैं, आमतौर पर पानी के घूंट, अदरक और प्रसाद से। सूप का ठेकुआ और फल वहां मौजूद सभी लोगों में बांटे जाते हैं, और छठ का प्रसाद पाना अपने आप में आशीर्वाद माना जाता है।

व्रत के नियम और उनकी कठोरता

छठ का व्रत हिंदू परंपरा के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, और इसके नियमों का पालन बड़ी बारीकी से किया जाता है:

  • निर्जला व्रत: 14 नवंबर के खरना के भोजन से 16 नवंबर की सुबह पारण तक व्रती न अन्न लेती हैं, न जल।
  • रसोई की शुद्धता: प्रसाद नहाने के बाद ही, पूजा के लिए अलग रखे बर्तनों में, साफ चूल्हे पर बनता है, और उसमें प्याज, लहसुन या बासी सामग्री नहीं लगती। कई घरों में मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से प्रसाद बनता है।
  • सादा जीवन: व्रती चारों दिन जमीन पर चटाई या कंबल बिछाकर सोती हैं और नए या धुले कपड़े पहनती हैं; परंपरा से बिना सिला वस्त्र, जैसे ऐसी साड़ी जिसके साथ कोई सिला कपड़ा न पहना जाए, घर के रिवाज के अनुसार।
  • निरंतरता: जिस घर में एक बार छठ उठा ली जाती है, परंपरा से वहां यह व्रत हर साल होता है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है, जब तक कोई गंभीर बीमारी बीच में न आ जाए।
  • कोई छोटा रास्ता नहीं: मुख्य व्रत का कोई "आसान" रूप नहीं है, हालांकि बुजुर्गों और बीमारों की ओर से घर का कोई दूसरा सदस्य यह व्रत रख सकता है।

इस कठोरता को कष्ट नहीं, बल्कि तपस्या माना जाता है, यानी प्रेम से अर्पित किया गया संयम, और व्रती अक्सर कहती हैं कि यह व्रत उन्हें थकाता नहीं, बल्कि शक्ति देता है।

प्रसाद: ठेकुआ और सूप

ठेकुआ छठ का सबसे खास प्रसाद है: गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बना, हाथ से दबाकर आकार दिया गया पकवान, जिसमें सौंफ या सूखा नारियल डाला जाता है और जिसे कड़ा होने तक तला जाता है। लंबे समय तक खराब न होने के कारण यह दूर के घाटों तक के सफर के लिए आदर्श प्रसाद बना, और लाखों लोगों के लिए इसका स्वाद घर का स्वाद है। ठेकुआ के साथ सूप में चावल के लड्डू (कसार), साबुत फल जैसे केला, सिंघाड़ा और डाभ नींबू (बड़े आकार का नींबू), नारियल, और गन्ने भी रखे जाते हैं; गन्नों से घाट पर एक छोटा मंडप भी बनाया जाता है। सब कुछ साबुत और बेदाग अर्पित किया जाता है; सूर्य को अर्पित होने से पहले कुछ भी चखा नहीं जाता।

घाट की तैयारी

संध्या अर्घ्य से कई दिन पहले लोग मिलकर नदी और तालाब के किनारे साफ करते हैं, मिट्टी काटकर सीढ़ियां बनाते हैं, और चटाइयां बिछाकर रंगोली सजाते हैं। हर घर गन्ने के डंडों और दीयों से अपनी छोटी सी जगह घेर लेता है। जहां कोई प्राकृतिक जलाशय नहीं होता, वहां अस्थायी तालाब खोदे जाते हैं या पानी की टंकियां बनाई जाती हैं, और बड़े शहरों में नगर निगम अब पार्कों में कृत्रिम घाट बनाते हैं। अगर आप अपनी जगह खुद तैयार कर रहे हैं, तो तीन बातें ध्यान रखें: व्रती कमर तक पानी में सुरक्षित खड़ी हो सकें, शाम के अर्घ्य के लिए पश्चिम का क्षितिज और सुबह के अर्घ्य के लिए पूर्व का क्षितिज दिखना चाहिए, और जगह को वैसी ही साफ छोड़ें जैसी वह मिली थी। घाट की सफाई अपने आप में छठी मैया की सेवा मानी जाती है।

घर से दूर छठ

दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता में बड़ी संख्या में बसे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए घर से दूर छठ मनाना अब एक पक्की परंपरा बन चुका है। दिल्ली में यमुना के घाट, मुंबई में जुहू और दूसरे समुद्र तट, बेंगलुरु और हैदराबाद की झीलें, और कोलकाता में हुगली के घाट, सब जगह भारी भीड़ जुटती है। हाउसिंग सोसायटियां भी अब अपने परिसर में पानी की छोटी टंकियां या हवा भरने वाले पूल लगाने लगी हैं, ताकि बुजुर्ग व्रतियों को दूर न जाना पड़े। अगर आप किसी सामूहिक घाट तक नहीं पहुंच सकते, तो खुले आसमान के नीचे छत पर पानी से भरा साफ टब भी मान्य विकल्प है; व्रत में सच्ची श्रद्धा जलाशय के आकार से ज्यादा मायने रखती है। बस पंचांग पेज पर अपने शहर का सटीक सूर्यास्त और सूर्योदय पक्का कर लें, क्योंकि बेंगलुरु या मुंबई में अर्घ्य का समय पटना से काफी अलग होता है।

कई लोग कार्तिक के पूरे मौसम में छठ से पहले या बाद में घर पर सत्यनारायण कथा या सूर्य पूजा भी करवाते हैं, खासकर जब घर के बुजुर्ग पूरा व्रत नहीं रख पाते। अगर आप चाहते हैं कि आपके शहर में कोई योग्य पुरोहित ऐसी पूजा करवाएं, तो Purohit.app के जरिए जांचे-परखे पुरोहित के लिए अनुरोध भेज सकते हैं और अपने ही घर में सही विधि से पूजा करवा सकते हैं, चाहे आप पटना में हों या वहां से बहुत दूर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में छठ पूजा कब है?

छठ पूजा 2026 शुक्रवार, 13 नवंबर (नहाय-खाय) से सोमवार, 16 नवंबर (उषा अर्घ्य) तक है। शाम का मुख्य अर्घ्य, यानी संध्या अर्घ्य, रविवार, 15 नवंबर 2026 को है।

15 और 16 नवंबर 2026 को अर्घ्य किस समय देना चाहिए?

संध्या अर्घ्य 15 नवंबर को ठीक सूर्यास्त के समय और उषा अर्घ्य 16 नवंबर को ठीक सूर्योदय के समय दिया जाता है। समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए घाट जाने से पहले Purohit.app के पंचांग पेज पर अपने शहर का सूर्योदय और सूर्यास्त देख लें।

2026 में छठ अक्टूबर के आखिर के बजाय नवंबर में क्यों है?

2026 अधिक मास का साल है, यानी हिंदू पंचांग में एक अतिरिक्त चंद्र मास जुड़ा है। इससे पूरा त्योहारी मौसम आगे खिसक गया, इसलिए दिवाली 8 नवंबर को है और छठ उसके बाद 13 से 16 नवंबर तक।

छठ का व्रत कितने समय का होता है?

मुख्य व्रत लगभग 36 घंटे का होता है, बिना अन्न और जल के: 14 नवंबर को सूर्यास्त के बाद खरना के भोजन से 16 नवंबर 2026 को सूर्योदय के बाद पारण तक।

छठी मैया कौन हैं?

छठी मैया वह मातृ देवी हैं जिनकी छठ में पूजा होती है; लोक परंपरा में उन्हें सूर्य देव की बहन और बच्चों की रक्षक षष्ठी देवी का ही रूप माना जाता है। श्रद्धालु उनसे अपने परिवार की सेहत, समृद्धि और लंबी उम्र की प्रार्थना करते हैं।

क्या नदी या तालाब के बिना छठ की जा सकती है?

हां। जहां कोई प्राकृतिक जलाशय नहीं होता, वहां श्रद्धालु कृत्रिम तालाब, सोसायटी की पानी की टंकियां, या छत पर खुले आसमान के नीचे पानी से भरा बड़ा साफ टब भी इस्तेमाल करते हैं। अर्घ्य देते समय व्रती का मुख फिर भी डूबते और उगते सूर्य की ओर होना चाहिए।

क्या छठ पूजा के लिए पुरोहित की जरूरत होती है?

छठ की मुख्य रस्में व्रती खुद, बिना पुरोहित के करती हैं। फिर भी कई लोग कार्तिक के मौसम में घर पर सूर्य पूजा या सत्यनारायण कथा करवाते हैं, और इनके लिए Purohit.app के जरिए पुरोहित बुक किए जा सकते हैं।

ठेकुआ क्या है और यह इतना खास क्यों है?

ठेकुआ छठ का पारंपरिक प्रसाद है, यानी गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनी तली हुई मिठाई। इसे दोनों अर्घ्य के समय सूप में रखकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है और फिर आशीर्वाद के रूप में घर के लोगों और पड़ोसियों में बांटा जाता है।

हम कैसे जाँचते हैं: हमारी गाइड में दी गई तिथियाँ और मुहूर्त प्रकाशित करने से पहले पंचांग से मिलाए जाते हैं, और व्यावहारिक बातें - सामग्री, समय, दक्षिणा - Purohit.app पर हुई असली बुकिंग पर आधारित हैं। परंपराएँ समुदाय के अनुसार अलग होती हैं; आपके पुरोहित की सलाह ही मान्य है। यह पेज हमारी अंग्रेज़ी गाइड का अनुवाद है। कहीं कोई बात अलग लगे, तो अंग्रेज़ी पेज को ही सही मानें।

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